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दूसरों को देखने से...

Posted on by Jain Terapanth News

दूसरों को देखने से...

दूसरों को देखने से पहले स्वयं को देखें : मुनिश्री
Updated on: Sat, 15 Sep 2012 10:56 PM (IST)

मंडी गोबिंदगढ़ : जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
जब हमें अपने गुणों का अभिमान होने लगता है तो हम दूसरों में दोष भी अधिक देखने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि अपने को और श्रेष्ठ मानते हैं और यहीं से हमारा अभिमान बढ़ता जाता है। अपने आफिस में हम वरिष्ठ हैं, हमारे अधीनस्थ कई लोग हों तो हमारा एक दायित्व दूसरों के दोष देखना भी होता है। असल में यह अधिकार इसलिए मिला है कि हम दोष देखें और उसे दूर करे, लेकिन ज्यादातर लोग दोष देखकर सामने वाले को नीचा दिखाते हैं, अपमानित करते है और लगातार इस भावना से स्वयं को ऊंचा समझने लगते हैं। इस क्रिया के कारण हम स्वयं भी निर्दोष नहीं रह पाते।

ये शब्द मुनिश्री विनयकुमार जी आलोक ने अर्हम्सदन शास्त्री नगर में चातुर्मासिक व्याख्यानमाला में बोलते हुए कहे। मुनि प्रवर ने कहा कि अपने सहयोगी और अधीनस्थों के काम करते हुए परिणाम का केवल ऊपरी सतह से मत देखिए। यदि हम प्रतिदिन थोड़ा अभ्यास ध्यान का करते हैं तो हमारे स्वभाव में अपने भीतर जाने की प्रवृत्ति बन जाती है, जो हमारे कर्म के कारण आती है। जैसे ही धारण का परिणाम आया हम किसी भी व्यक्ति के बाहरी परिणाम पर नही टिकेंगे, थोड़ा उसके भीतर जाकर विश्लेषण करेगे आखिर मूल में है क्या? श्रीराम के लिए तुलसीदास जी ने कहा है कि उनसे जुड़े लोग मन, वचन और और कर्म से चूक भी जाएं तो राम मन के भाव को पकड़ लेते हैं। मन और वचन भी चूक पर ध्यान नहीं देते। यही से वे अपने साथियों को सुधारने में लग जाते हैं। इसलिए दूसरों के दोष को दूर करने में केवल देखने का इरादा नही, भीतर उतरकर मन के भाव को पकड़कर दोष निवारण किया जाए क्योकि मूल रूप से सबका स्वरूप निर्दोष ही है। दोष तो एक बाहरी व्यक्ति की तरह आता है और भेजा भी जा सकता है। इसलिए अपने से जुड़े लोगो के साथ व्यवहार करते समय केवल सही निर्णय ही न ले, उनके भीतर झांकने का प्रयास करे। हर एक के भीतर एक योग्यता, प्रतिभा छीपी है। व्यक्ति की विश्व अवस्था का नाम प्रतिभा है। इसे टटोलने के लिए पहले स्वयं अपने भीतर उतरने की तैयारी करे और फिर ईश्वर के भीतर उतरकर प्रोत्साहन के साथ उसकी प्रतिभा को अपने कामकाज से जोड़ें।

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