संस्कारों के अभाव में टूट रहे परिवार : मुनिश्री
संस्कारों के अभाव में टूट रहे परिवार : मुनिश्री
Updated on: Mon, 15 Oct 2012 02:30 AM (IST)
मुखत्यार सिंह, मंडी गोबिंदगढ़ : जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
स्टील सिटी मंडी गोबिंदगढ़ के आऊटडोर स्टेडियम में रविवार को आचार्य श्री महाश्रमणजी के आज्ञानुवर्ती मनीषी संत मुनिश्रीविनय कुमार जी आलोक के सान्निध्य में टूटते रिश्ते बिखरते परिवार कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में शंकराचार्य स्वामी श्री ओंकारानान्द सरस्वती जी महाराज परमात्मा मठ, प्रयागपीठ, इलाहाबाद एवं अध्यक्ष विश्व कल्याण परिषद दिल्ली मुख्यातिथि थे। वहीं, स्वामी बुद्धपुरी जी महाराज किला रायपुर वाले मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए।
समारोह की अध्यक्षता पंजाब के कैबिनेट मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा ने की। उद्बोधन की रस्म मुनिश्रीअभय कुमार जी ने निभाई। अपने व्याख्यान में मुनिश्री आलोक ने कहा कि पहले समाज है या पहले परिवार है, इसे समझने की जरूरत है। इसके लिए एक अंक सबसे महत्वपूण है। उसके बाद बिंदी का महत्व होता है। जो व्यक्ति अपने मां-बाप का होकर नहीं रहता, उसका कोई मूल्य नहीं रहता। आज हर परिवार में टूटन है। संत प्रेरणास्रोत है। जब उनमें जुड़ाव नहीं तो वह परिवार या समाज को जोड़ने के लिए कैसे सहायक हो सकते है।
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कोठियां बड़ी, पर दिल हो गए छोटे
मुनिश्री ने आगे फरमाया कि सबसे पहले स्वयं के साथ जुड़ना आवश्यक है, तब परिवार जुड़ सकता है। पहले विदेशों में सुना जाता था कि परिवार नाम की कोई संस्था नहीं है, परंतु अब हमारे घरों में भी वैसी ही स्थिति हो गई है। बड़ी-बड़ी कोठिया तो जरूर है, परंतु दिल छोटा है। बेटों को खुली स्वतंत्रता दी जाती है तभी वह मां-बाप को नहीं पूछते है। अगर उन्हे बचपन में अच्छे संस्कार दिए जाते तो आज परिवारों के टूटने की नौबत न आती। जब बच्चों में संस्कार नौकरों के मिल रहे है तो उनका जीवन नौकरों से भी गंदा ही होगा।
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तीन सूत्रों से सफल होगा जीवन
मुनिश्री ने फरमाया कि अगर जीवन में तीन सूत्र अपनाएं जाएं तो परिवार खुशहाल बन सकता है। उनमें पहला सूत्र सौहार्द, दूसरा समता तथा तीसरा व्यक्ति के जीवन में संयम का संस्कार है। इन तीनों से परिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन तथा राष्ट्र जीवन में बिखराव आने की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। आचार्य तुलसी ने परिवार के एकजुट रखने पर अधिक जोर दिया था। अंत में मुनिश्री ने लोगों को भ्रूण हत्या न करने का संकल्प दिलाया।
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विश्वास के बिना नहीं होगा जुड़ाव
शकराचार्य श्री ओंकारानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि संत जीवन का उद्ेश्य परिवार को जोड़ने का है जो बिना श्रद्धा व विश्वास के संभव नहीं है। पती-पत्नी का विश्वास, पिता पुत्र का विश्वास आवश्यक है। समय बहुमूल्य है, कब किसे क्या मिल जाए हमें ज्ञात नहीं। हमें आपस में एकता व समन्वय को आगे बढ़ाना है।
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..तो स्वर्ग बन जाता है गृहस्थ जीवन
उन्होंने कहा कि संतों का परिवार ही एकजुट नहीं है। सभी एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए है। जब संत समाज एक नहीं है तो वह दूसरों के परिवार को टूटने से कैसे रोक सकते है। सभी संतों को एकमत होकर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के लिए कार्य करना चाहिए। अगर पति-पत्नी में सामंजस्य हो तो गृहस्थ जीवन स्वर्ग बन सकता है। धन की लालसा ही परिवार के बिखरने का मूल कारण है। धन तो गुलाम बनाना जानता है, जिससे बचने की जरूरत है। इस दौरान मुनिश्री अभय कुमार जी, स्वामी इंदु पुरी जी महाराज, स्वामी विकासचंद विमल ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए।
संयोजन समिति के चेयरमैन देवी दयाल पराशर, अध्यक्ष प्रकाश चंद गर्ग, मंत्री सुरेन्द्र मित्तल, मेंबर तरसेम लाल मंगला, रमेश मित्तल, पवन शारदा, घनश्याम दास गुप्ता, राकेश गुप्ता, सजन गोयल, नरेन्द्र भाटिया, राम निवास जैन, आनन्द जैन, हेमंत गेायल, पंकज जैन, हरिओम, राम गोपाल जैन, जीवन लाल सिंगला, जोगेन्द्र पाल गर्ग, अमन मित्तल, पुनीत जैन, अशोक आर्य, विजय सिंगला, रमन मित्तल, लक्ष्मी मित्तल, रीटा गर्ग, रमेश जैन आदि ने संत समाज एवं अतिथियों का अभिनन्दन किया।
इस मौके पर रिमट ग्रुप के चेयरमैन डा. हुक्मचंद बासल, रणधीर सिंह भाबरी चेयरमैन मार्केट कमेटी अमलोह, सुखविन्द्र सिंह भाबरी, प्रवीण जैन, जीवन सिंगला, मोतीराम सेतिया, हरपाल सिंह नसराली कौंसलर, उद्योगपति जेपी गोयल, पवन शारदा, लक्ष्मी मित्तल, उमा सिंगला, रीटा गर्ग आदि उपस्थित हुए।
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संत समागम में रखड़ा हुए निहाल
समारोह की अध्यक्षता करने वाले कैबिनेट मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा ने अपने आप को संतों के इस कार्यक्रम में भागीदारी करने को भाग्यशाली बताया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में ऐसे संत समागम की बहुत आवश्यकता है। समारोह का समापन सुरेन्द्र मित्तल के धन्यवाद से किया गया।