MONDAY, NOVEMBER 7, 2011
MONDAY, NOVEMBER 7, 2011
प्रोढ़ चिंतन है आदर्श परिवार का आधार: मुनि अर्हत्
सिरसा जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
समझपूर्वक बनाया गया समूह ही समाज कहलाता है, जिसकी सबसे छोटी इकाई परिवार है। परिवार सामंजस्य की एक प्रयोगशाला है। जिंदगी की जंग में वही लोग आगे बढ़ते हैं, जिनका ङ्क्षचतन सकारात्मक होता है। क्योंकि सकारात्मक चिंतन परिवार के सौंदर्य को निखारता है। पति-पत्नी परिवार के दो ऐसे आधार स्तम्भ हैं, जिनके सहयोग एवं सामंजस्य के आधार पर ही परिवार का विकास निर्भर है। उक्त विचार आचार्य श्री महाश्रमण जी के शिष्य मुनि श्री अर्हत् कुमार ने तेरापंथ जैन भवन में आयोजित कार्यक्रम दंपत्ति शिविर में 'टूटते रिश्ते-बिखरते परिवारÓ विषय पर प्रकट किये। उन्होंने कहा कि बोद्धिक युग में शिक्षा का जितना विकास हो रहा है, उतना ही मूल्यों का ह्रास भी हो रहा है। यह एक ज्वलंत समस्या है परिवार टूट रहे हैं और रिश्तों में दरार पड़ रही है। किसी भी घर के वातायन से झांक कर देख लें क्लह, ईष्र्या, घृणा, पक्षपात, विद्रोह के साए चलते नजर आ रहे हैं। अपनों के मध्य पराएपन का अहसास है। ऐसी अनकही तनावों की भीड़ में एक पल भी मानसिक शांति के लिए दिल में प्यास है। उन्होंने कहा कि घर टूटता है तो दीवारें टूटती हैं। अगर आदमी टूटता है तो साहस, शक्ति, धैर्य, संकल्प, विश्वास बहुत कुछ टूटता है। अंत: मूल्यों की सुरक्षा का दायित्व बुद्धिजीवी महिलाओं पर आता है कि वे शिक्षा के साथ ऐसे संस्कारों को जगाएं ताकि पारिवारिक जीवन में समरसता पैदा कर सकें। इस अवसर पर सहयोगी संत मुनि श्री भरत कुमार जी ने कहा कि बड़ों का भी दायित्व बनता है कि वे परिवार के छोटे सदस्यों पर अधिकारों को थोपे नहीं अपितु उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास करें। स्वयं में सहिष्णुता, धैर्य, सामंजस्य, समर्पण, प्रेम, सह अस्तित्व जैसे महत्वपूर्ण मूल्यों का संवर्धन करें, जिससे कि तनावमुक्त जीवनशैली के साथ-साथ एक आदर्श व सुव्यवस्थित परिवार का निर्माण हो सके।