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कषाय ही भव भ्रमण का...

Posted on by Jain Terapanth News

कषाय ही भव भ्रमण का...

कषाय ही भव भ्रमण का मूल कारण - आचार्य श्री महाश्रमण
बालोतरा. 27 नवम्बर 2012 जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो
क्रोध, लोभ, अहंकार जैसे कषाय आत्मगुणों को नष्ट करने वाले होते हैं। यह कषाय ही भव भ्रमण का मूल कारण बनता है। अनिगृहित क्रोध और मान, प्रवर्धमान माया और लोभ-ये चारों संक्लिष्ट कषाय पुनर्जन्म रूपी वृक्ष की जड़ों का सिंचन करते हैं। यह कषाय ही आत्मा को संस्कारोन्मुखी बनाता है। आदमी यह प्रयास करें कि अनुदित कषाय का निरोध और उदय प्राप्त कषाय का विफलीकरण हो सके। स्वामी रामतीर्थ, जो गणित के बहुत बड़े प्रोफेसर थे, अमेरिका से लौट रहे थे। बीच में हांगकांग में अपने मित्र के घर ठहरे। उस समय वहां अधिकतर मकान लकड़ी के बने थे। रात्रि में अचानक पड़ोस में भयंकर आग लग गई। अनेक लोग आग बुझाने के लिए वहां पहुंच गए। घर से सामान बाहर निकाला गया। कुछ देर बाद किसी ने पूछा कि मकान मालिक कहां है। जबाव मिला उसे तो बाहर निकालना की भूल गए। स्वामी रामतीर्थ अपनी डायरी में लिखते हैं - सामान बचा लिया गया, मालिक जल कर राख हो गया। जिस प्रकार मालिक की सुरक्षा के बिना सामान का बचना ज्यादा महत्व नहीं रखता, उसी प्रकार आत्मगुणों की सुरक्षा के बिना मात्र शरीर को पोषण अधिक महत्व नहीं रखता है। शरीर-धारण का लक्ष्य तो अत्तहिय_याए होना चाहिए। कषायों से आत्मा को बचाने का होना चाहिए। किंतु जब तक सही दृष्टि प्राप्त नहीं होगी। अध्यात्म की दृष्टि नहीं मिलेगी। तब तक आत्मा न तो पापों से बच सकेगी और न ही उध्र्वगामी बन सकेगी। आदमी ऋण ये उऋण बनने का, व्रण से स्वस्थ रहने का, अग्रि से सुरक्षित रहने का और कषाय से अप्रभावित रहने का संकल्प और प्रयास करे। सही दिशा में किया गया प्रयास अवश्य ही वीतरागता का पथ प्रशस्त कर सकेगा।

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