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आकार का नहीं सार का महत्व

Posted on by Jain Terapanth News

आकार का नहीं सार का महत्व

आकार का नहीं सार का महत्व
आओ हम जीना सीखें


बालोतरा. 25 नवम्बर 2012 जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो

जीवन में शक्ति का मूल्य होता है आकार छोटा है या बड़ा, यह गौण बात है। सार कितना है, यह मूल बात है। आदमी शरीर से हष्ट-पुष्ट होता है, मोटा दिखाई देता है, परंतु शक्ति ज्यादा नहीं है। न ज्यादा तेज चल सकता है, न तेज दौड़ सकता है और न अतिश्रम कर सकता है। ऐसे बड़े अथवा मोटे आदमी का ज्यादा मूल्य नहीं होता। दुबला-पतला दिखाई देने वाला व्यक्ति भी अच्छा श्रम कर सकता है। ऐेसे छोटे या दुबले आदमी का मूल्य होता है। आकार का महत्व कहीं-कहीं हो सकता है। ज्यादा महत्व प्रकार का होता है, सार का होता है। किसी को छोटा मान कर यदि उपेक्षा की जाए तो कभी-कभी भयंकर स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऋण, व्रण, अग्रि और कषाय-इन चारों को थोड़ा समझकर उपेक्षित नहीं करना चाहिए। ये थोड़े भी बहुत होते हैं। पहली बात है 'अणथोवं' अर्थात् ऋण को कभी थोड़ा नहीं मानना चाहिए।

आज थोड़ा है, किंतु ब्याज बढ़ते-बढ़ते कभी भारी-भरकम बन सकता है। व्यक्ति को जल्दी से जल्दी ऋणमुक्त बनने का प्रयास करना चाहिए। ऋण पैसों का भी हो सकता है और कर्मों का भी हो सकता है। कर्मों का कर्जा तो पैसों के कर्जे से भी भारी होता है। अगर जीवन में कोई पाप हो गया, दोष लग गया तो उसका जल्दी से जल्दी शोधन हो जाए, प्रायश्चित किया जाए। प्रायश्चित का प्रथम सोपान है-आलोचना। आलोचना के लिए आवश्यक है ऋजुता। यदि ऋजुता नहीं हो तो आलोचना सम्यक् प्रकार से नहीं हो सकती। आचार्य तुलसी बहुधा कहा करते थे कि सामने आलोचना करनी चाहिए। होशियारी का क्षेत्र अपना अलग हो सकता है। आदमी में यह विवेक होना चाहिए कि कहां होशियारी काम ले लेनी चाहिए और कहां ऋजुता का प्रयोग करना चाहिए। जहां आलोचना का प्रसंग हो, वहां ऋजुतापूर्ण होशियारी हो सकती है। मात्र चतुराई नुकसानदेह हो सकती है। व्यक्ति सरलता के साथ आलोचना करे और जो जो प्रायश्चित गुरू से प्राप्त हो, उसे सहर्ष स्वीकार करे। इसके साथ एक और संकल्प जाग जाए कि मैं दोषों की पुनरावृत्ति नहीं करूंगा।

अतीत में मैंने जिस दोष का सेवन किया, उसे दुबारा आचरित नहीं करूंगा। पुन: गलती न करने का संकल्प जाग जाए तो प्रायश्चित अधिक सार्थक सिद्ध हो सकता है। अत: आदमी ऋण को थोड़ा न माने। वह थोड़ा भी बहुत होता है। ऋण चाहे धन का हो अथवा कर्मों का, आदमी ऋणमुक्त रहने का, ऋण से उऋण बनने का प्रयास करे।

आचार्य महाश्रमण

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