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संघ में रहें और उपयोगी बनें

Posted on by Jain Terapanth News

संघ में रहें और उपयोगी बनें

संघ में रहें और उपयोगी बनें
आओ हम जीना सीखें


बालोतरा. 24 अक्टूम्बर 2012 जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो

साधना के क्षेेत्र में संघ का बहुत महत्व होता है। संघ में असहाय को सहारा मिल सकता है। कभी शारीरिक अस्वस्थता की स्थिति बन सकती है तो कभी मानसिक अस्वस्थता की स्थिति भी बन सकती है, ऐसी स्थितियों में दूसरों के आलंबन की अपेक्षा रहती है। संघ में आलंबन मिल सकता है, संभालने वाले मिल सकते हैं, प्रेरणा मिल सकती है। साधक यह चिंतन करें कि संघ हमारा बहुत उपकारी है। हम संघ से सेवा ले रहे हैं, किंतु हम संघ को क्या दे रहे हंै और क्या दे सकते हैं। संघ के लिए हम उपयोगी कैसे बन सकते हैं? व्यवस्थागत निर्णय भी उपयोगिता के आधार पर किए जाते हैं। कुछ वर्ष पहले की बात है। संघीय अपेक्षा से किसी साधु को कुछ समय के लिए बहिर्विहार में भेजना था। मैं गुरुदेव तुलसी के पास गया और अपना प्रस्ताव रखा, अमुक संत को बाहर भेजा जा सकता है। उस वक्त गुरुदेव ने जो बात कही, वह मेरे लिए बोध पाठ बन गई। गुरुदेव ने कहा कि तुम्हारा सुझाव ठीक है किंतु उसकी उपयोगिता यहां ज्यादा है। वह यहां अच्छा काम कर रहा है। मुझे एक बोध पाठ मिल गया कि व्यक्ति को उपयोगी बनना चाहिए। अगर उपयोगिता है तो उसकी प्रतिष्ठा होती है, सम्मान मिलता है, कार्य करने का भी अवसर मिलता है। धर्मसंघ में हमारी उपयोगिता बनी रहे, इसके लिए जरुरी है कि आदमी यह चिंतन करे कि कोई ऐसी स्थिति न बन जाए, जिसके लिए संघ को सोचना पड़े। जितनी हो सके, संघ को सेवा देने का प्रयास करुं। मेरे द्वारा कोई असेवा का कार्य न हो जाए। एक साधक संघ ने उपयोगी तभी बन सकता है जब संघ और संघपति के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव हो। संघीय जीवन में पारस्परिक संबंध भी होते हैं और कईयों के व्यक्तिगत संबंध में बन सकते हंै। किंतु संघीय व्यक्ति को यह चिंतन करना चाहिए कि व्यक्तिगत संबंध एक सीमा तक है। संघ उससे भी बड़ा है। जहां संघहित का प्रश्र है, संघीय गरिमा प्रश्र है, जहां व्यक्तिगत संबंध गौण है और संघहित मुख्य है। साधना के विकास के बिना इस प्रकार की संघीय भावना का जागना भी कठिन होता है। हमने जिस गुरु परंपरा को स्वीकार किया है, जिस व्यवस्था को स्वीकृत किया है, उसके प्रति भी हमारा पूर्ण समर्पण का भाव होना चाहिए। गुरु को जहां, जिसकी उपयोगिता नजर आए, उसको वहीं नियोजित करे, यही हमारे लिए श्रेयस्कर है। हमारी जितनी उपयोगिता बढ़ती है, हम उतनी ही अधिक संघ को सेवा दे सकते हैं। एक व्यक्ति बहुत सेवाभावी है। जहां कहीं सेवा की अपेक्षा हो, वह तैयार रहता है। वह सेवा की दृष्टि से बड़ा उपयोगी बन जाता है। एक व्यक्ति आगम विशेषज्ञ है। आगमों के रहस्यों को जानने वाला है। कोई शोध निबंध लिखवाना हो, चर्चा वार्ता का प्रसंग हो तो आगम विशेषज्ञ व्यक्ति तैयार रहता है। इस क्षेत्र में वह बहुत उपयोगी बन सकता है। इस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों से व्यक्ति अपनी उपयोगिता को बढ़ा सकता है।

आचार्य महाश्रमण

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